पर्मेश्वर का उपहार (आपके लिए)

आदि में पर्मेश्वर, उसके पुत्र यीशु मसीह, और पवित्र आत्मा थे। उन्होंने पृथ्वी और जो कुछ इसमें है, उन सब कि सृष्टि की। अपने प्रेम में, पर्मेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया और उसे एक सुंदर वाटिका में रखा। मनुष्य ने परमेश्वर के निर्देशों का पालन नहीं किया। यह अनाज्ञाकारिता पाप था और इस पाप ने मनुष्य को पर्मेश्वर से अलग कर दिया। पर्मेश्वर ने उनसे कहा कि अपने पापों कि क्षमा के लिए उन्हें निर्दोष एवम् निष्कलंक छोटे पशुओं का बलिदान देना होगा। इन बलिदानों ने उनके पाप का मूल्य नहीं चुकाया परंतु केवल उस सर्वश्रेष्ठ बलिदान की तरफ इशारा किया जो पर्मेश्वर स्वयं प्रदान करेंगे। एक दिन परमेश्वर अपने पुत्र यीशु को इस पृथ्वी पर भेजेंगे ताकि सभी लोगों के पापों के लिए वह अंतिम और सर्वश्रेष्ठ बलिदान हों।

 

मरियम और स्वर्गदूत

चार हज़ार वर्ष पश्चात्, नासरत नाम के एक शहर में, मरियम नामक एक कुंवारी स्त्री रहती थी। उसकी मंगनी यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी। एक दिन एक स्वर्गदूत ने मरियम को दर्शन दिया और उससे कहा कि वह एक विशेष बालक को जन्म देगी। उसका नाम यीशु रखना होगा। इस बच्चे का कोई सांसारिक पिता नहीं होगा। वह पर्मेश्वर का पुत्र होगा।

 

यीशु का जन्म

स्वर्गदूत से भेंट के पश्चात्, यूसुफ और मरियम ने कर का भुगतान करने के लिए बेथलहम कि ओर एक लंबी यात्रा की। जब वे बेतलेहेम पहुंचे, तो शहर में बड़ी भीड़ थी। सराय में कोई जगह नहीं मिलने के कारण उन्होंने रात एक गौशाले में बिताई। वहां यीशु का जन्म हुआ। मरियम ने बालक यीशु को एक कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा।

 

चरवाहे

उसी रात, शहर के बाहर एक पहाड़ी पर, चरवाहे अपनी भेड़ों कि रखवाली कर रहे थे। प्रभु का एक दूत उनके पास आ खड़ा हुआ, और प्रभु का तेज उनके चालों ओर चमका। स्वर्गदूत ने कहा, "मत डरो। क्योंकि देखो, मैं तुम्हें बड़े आनंद का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिये होगा। इस रात एक उद्धारकर्ता जन्मा है। वह प्रभु यीशु मसीह है। तुम एक बालक को कपड़े में लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा पाओगे।" तब एकाएक बहुत से स्वर्गदूतों ने पर्मेश्वर की महिमा और स्तुति करते हुए कहा, "आकाश में परमेश्वर की महिमा, और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है, शांति हो"। जब स्वर्गदूत उनके पास से चले गए, तब चरवाहे अपनी भेड़ों को छोड़ तुरंत बैतलहम को चल दिए। और जैसा स्वर्गदूत ने उनको कहा था उन्होंने बच्चे को ठीक वैसा ही पाया।

 

ज्योतिषी

यीशु के जन्म के पश्चात्, पूर्व देश से कई ज्योतिषी यरूशलेम में आकर पूछ्ने लगे, "यहुदियों का राजा जिसका जन्म हुआ है, कहाँ है? क्योंकि हमने पूर्व में उसका तारा देखा है और उसको प्रणाम करने आए हैं।" जब राजा हेरोदेस ने यह सुना, तो वह प्रसन्न नहीं हुआ। तब उसने लोगों के सब प्रधान याजकों और शास्त्रियों को एक साथ बुलाया। उन्होंने राजा को बताया कि भविष्यवक्ताओं ने कहा था कि एक शासक बैतलहम में पैदा होगा। राजा हेरोदेस ने ज्योतिषियों को इस राजा की खोज के लिए बेतलेहेम भेजा। ज्योतिषी राजा की बात सुनकर यरूशलेम से चले गए, और जो तारा उन्होंने पुर्व में देखा था वह उनके आगे-आगे चला और जहां बालक था, उस जगह के उपर पहुंचकर ठहर गया, उन्होंने उस घर में पहुंचकर बालक यीशु को देखा। उन्होंने मुँह के बल गिरकर बालक को प्रणाम किया, और अपना-अपना थैला खोलकर उसको सोना, और लोबान और गंधरस की भेंट चढ़ाई। पर्मेश्वर ने ज्योतिषियों को एक स्वप्न में चेतावनी दी कि उन्हें दुष्ट राजा हेरोदेस के पास वापस नहीं जाना चाहिए, इसलिए वे दुसरे मार्ग से अपने घर चले गए।

 

पर्मेश्वर के उपहार का कारण

यीशु परमेश्वर का पुत्र था। वह पाप रहित रहा और अपने सभी कार्यों में सिद्ध था। तीस वर्ष की आयु में, यीशु ने लोगों को पर्मेश्वर, अपने पिता के बारे में सिखाना शुरू किया। उसने कई आश्चर्यकर्म किए जैसे, अंधों को दृष्टि प्रदान कि, कई लोगों को बीमारियों से चंगा किया, और यहां तक कि मरे हुओं को भी जिलाया। इन सब से बढ़कर उसने स्वर्ग में अनन्त जीवन प्राप्त करने का मार्ग बताया। फिर उसने सारे जगत के पापों के बलिदान के लिये अपने प्राणों को दे दिया।

यूहन्ना ३:१६ में बाइबल कहती है, "क्योंकि पर्मेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिय, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट ना हो, परन्तु अनन्त जीवन पाये।" एक सर्वोच्च सर्वश्रेष्ठ बलिदान के रूप में क्रुस पर मरने के लिये यीशु इस संसार में आया। उनकी मृत्यु से, सभी पापों की कीमत चुकाई गई है। अब पाप के लिए बलिदान देने की आवश्यक्ता नहीं है। यह उद्धारकर्ता को भेजने के लिए पर्मेश्वर कि प्रतिग्या की पूर्ति थी।

यद्धपि यीशु दुष्ट मनुष्यों के द्वारा मार डाला गया, परंतु मृत्यु का उस पर कोई बल नहीं था। तीन दिन बाद वह कब्र से विजयी होकर जी उठा। उसके जी उठने के बाद के दिनों तक, यीशु बहुत से लोगों के द्वारा देखा गया। फिर एक दिन, अपने चेलों को आशीष देने के बाद, वह स्वर्ग में चला गया।

जब हम उस पर सम्पूर्ण विश्वास करते हैं और अपने जीवन को यीशु के हाथों में सौंपते हैं, तो उसका लहू हमें सभी पापों से शुद्ध करता है। जब हम उद्धार के इस उपहार को स्वीकार करते हैं, तब हमारा सम्बंध पर्मेश्वर के साथ फिर से जुड़ जाता है। यीशु हमारे व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता बन जाते हैं, और हम उनके बच्चे होने के आशीषों का आनंद उठा सकते हैं! एक दिन यीशु वापस आने वाले हैं। वह सभी सच्चे विश्वासियों को स्वर्ग में ले जाएंगे। वहाँ वे हमेशा के लिये अपने पर्मेश्वर के साथ रहेंगे।

मृत्यु के पश्चात्?

इस समय आप जीवित है, आप सांस ले रहे हैं, आप चल-फिर रहे हैं या कार्य कर रहे हैं या सो रहे हैं। आप चाहे आरामदायक जीवन जी रहे हैं या फिर पीड़ा में। सूर्य उगता है और ढलता है; कहीं पर किसी बच्चे का जन्म हो रहा है, तो कहीं पर किसी न किसी की मृत्यु भी निरन्तर हो रही है।

सम्पूर्ण जीवन केवल

एक अस्थायी प्रबन्ध है;

लेकिन मृत्यु के पश्चात्

आप कहां जाएंगे?

चाहे आप धार्मिक हों या सामान्यतः किसी धर्म में विश्वास नहीं करते हों – फिर भी आपके लिए इस आध्यात्मिक महत्वपूर्ण प्रश्न को तय करना आवश्यक है, क्योंकि धरती पर इस छोटे से जीवन के बाद मनुष्य अपने घर को सदा के लिए चला जाएगा (सभोपदेशक १२:५)।

किन्तु कहां?

कब्रिस्तान जहां आप दफन किए जा सकते हैं, वह आपकी आत्मा को रख नहीं सकती; या स्मशान घाट पर जहां आपकी देह जला दी जाती है, वो भी आपकी आत्मा को जला नहीं पाएगी; या सागर की गहराई में जहां आप डुब जाते हैं, वो भी आपकी आत्मा को डुबा नहीं पाएगी।

आपकी आत्मा कभी नहीं मरेगी!

स्वर्ग और पृथ्वी के परमेश्वर ने कहा है;

“स्मस्त आत्माएं मेरी हैं”

यहां के बाद "आप" अपनी आत्मा से, किसी स्तान पर अपने कार्य के अनुसार, अच्छा या बुरा, जो भी आपने जीवित रहकर इस जीवन में किया, मिलेंगे (इब्रानियों ९:२७)।

हम इमानदारी से आराधना कर सकते हैं।

हम अपने बुरे कार्यों के लिए अपनी गलती का अनुभव कर सकते हैं।

हम चोरी के माल वापस दे सकते हैं।

निसंदेह ये सब आवश्यक हैं।

लेकीन

हम अपने पापों को शुद्ध नहीं कर सकतें।

स्वर्ग के परमेश्वर, जो समस्त पृथ्वी के सच्चा न्यायाधीश हैं, आपके पाप और जीवन को जानते हैं – उनसे कुछ भी गुप्त नहीं। आप अपने पाप समेत परम सुख और आनेवाले संसार की महिमा में कभी भी प्रवेश नहीं कर सकतें।

लेकिन, यही स्वर्गीय परमेश्वर प्रेमी परमेश्वर हैं। उन्होंने आपके जीवन और आपकी आत्मा के उद्धार के लिए एक मार्ग बनाया है। आवश्यक नहीं कि आपको अनन्त काल के दंड और नरक की आग में डाल दिया जाए। परमेश्वर ने आपकी आत्मा को बचाने के लिए यीशु को संसार में भेजा। यीशु ने आपके पाप को अपने ऊपर उस वक्त ले लिया जब उसने कलवरी के क्रूस पर दुख उठाया और मर गया। परमेश्वर ने स्वर्ग में जो सबसे अच्छा था, आपके पाप के लिए बलिदान के रूप में दे दिया। “वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हमलोग चंगे हो जाएं” (यशायाह ५३:५)। ये शब्द यीशु के लिए उसके आने से बहुत वर्ष पहले कहे गए थे।

क्या आप विश्वास करेंगे कि यीशु आपसे प्रेम करते हैं? क्या आप प्रार्थना करेंगे और अपने पापों को उसे बताएंगे? क्या आप पश्चाताप करेंगे और जीवित परमेश्वर के पुत्र यीशु पर विश्वास करेंगे? उस पर पूर्ण समर्पण लाने पर, वह आपकी आत्मा को शान्ति पहुंचाएगा, और मृतयु के पश्चात् आपकी महिमापूर्ण जीवन देगा। उसके बाद ही आप महा आनन्द से भरे अनन्त घर का आश्वासन और अपनी आत्मा के लिए सुख पा सकते हैं।

किन्तु अहा! जो लोग अपने जीवन काल में यीशु के द्वारा मुक्ति प्रदान करनेवाले प्रेम को नाकारते हैं, उनके लिए नरक का दण्ड और अनन्त काल तक जलती रहने वाली आग प्रतीक्षा कर रही है। मृत्यु के पश्चात् न तो लौटने की बात होगी और न ही उद्धार पाने का कोई प्रश्न। "तब वह बायीं ओर के लोगों से कहेगा, ‘हे स्रापित लोगों, मेरे सामने से निकलो और उस अनन्त आग में जा पड़ो, जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गयी है।” (मत्ती २५:४१)। “इस निकम्मे सेवक को बाहर अंधेरे में डाल दो! वहां यह रोएगा और दांत पीसेगा” (मत्ती २५:३०)।

पवित्र बाइबल में परमेश्वर सम्पूर्ण पृथ्वी पर पर्याप्त रूप से होनेवाले अन्तिम भयानक न्याय के प्रति सावधान करते हैं। इन पवित्र शास्त्रो में यह भविष्यवाणी की जाती है कि बताए गए न्याय के दिन से पहले स्पष्ट एवं पूर्ण घोषित चिन्हों होंगे।

उसके आने से पहले युद्ध और युद्ध की चर्चाएं पीड़ा और राष्टों में घबराहट होगी एक राष्ट दूसरे राष्ट से लड़ेगा और कोई भी अपने बीच के मतभेद को दूर करने के लिए मार्ग निकाल नहीं पाएगा।

 विभिन्न स्थानों में भूकम्प और महामारी होगी। क्या हम अपने काल में इन भविष्यवाणियों को पूर्ण होते हुए नहीं देख रहे हैं? तब यह भी भविष्यवाणी की जाती है कि बुरे लोग और भी बिगड़ते चले जाएंगे। वैसे समय में लोग चेतावनी पर ध्यान नहीं देकर परमेश्वर से अधिक सांसारिक अभिलाषाओं के प्रेमी बन जाएंगे। पढ़िए मत्ती २४:६, ७ और १२!

याद रखें कि हमारे निष्पक्ष और महान न्यायाधीश हमारे वर्त्तमान धन या निर्धनता, यश या अपयश, रंग, वंश, जाति या धर्म से प्रभावित नहीं होंगे। किसी न किसी दिन हम अपने महान सृष्टिकर्त्ता और प्रभु के समक्ष खड़े होंगे और प्रभु हमारे कर्मों के अनुसार हमारा न्याय करेंगे। पढ़िए मत्ती २५:३२, ३३!

कभी भी खतम न होनेवाला अनन्तकाल जो आनेवाला है, वहां न तो कोई घड़ी होगी, न तो कोई वार्षिक कैलेन्डर और न ही सदियों की गणना की जाएगी।

पापी और अधर्मी की पीड़ा का धुआं हमेशा और हमेशा के लिए उठता रहेगा – जब कि उसी समय स्वर्ग में उद्धार पाए गए लोगों की खुशी, गीत परम सुख और आनन्द का भी अन्त न होगा।

अपना चयन अभी करें! इस से पहले की काफी देर हो जाए; “देखो, अभी वह उद्धार का दिन है!” (२ कुरिन्थियों ६:२)। मत्ती ११:२८-३० भी पड़े।

 

ड्रग्स, शराब और व्यभिचार के विषय में क्या?

शराब  ड्रग्स  अभिलाषा  अपराध  बंदीगृह  निराशा  मृत्यु

क्योंकि पाप की मजदुरी तो मृत्यु है (रोमियों 6:23)

आईये हम वास्तविकता का सामना करें। शराब, ड्रग्स और व्यभिचार जैसे भयंकर दैत्य परमेश्वर का महान और अच्छा सृष्टि पर हमला और उसे नाश कर रहे हैं। एक विशाल आक्टॅपस का स्पर्शक की तरह वे जवान और वृद्ध दोनों को अपनी झपटता और आकर्षित करता है।

एक संक्रामक बिमारी आज के समाज पर बड़े अनुपात में फैला हुआ है। शराब, ड्रग्स और व्यभिचार का श्राप बहुत से लोगों को बिना किसी लंगर के, अनन्त विनाश की और बहका ले गया है। लोग अपने मित्रों के द्वारा साथ ही संवादमाध्यम (मीडिया), पत्रिकाएं, समाचार पत्र और टेलीविजन की विज्ञापन के द्वारा चरित्रहीनता के विषय में सरलता से प्रभावित हुए हैं। मस्तिक में उस विन्दु तक प्रहार हुआ है जहाँ एक संभ्रम और हताशा का भंवर है, जिसका नतीजा आत्मिक और शारीरिक में नष्ट होना है।

ऐसा लज्जाजनक नैतिक व्यवहार के लिए दोषी कौन है? युवा पीढ़ा? शायद नहीं। बहुत से माता-पिता अपने नास्तिक जीविका के द्वारा पाप को स्वीकृति दिए हैं जो उन्हीं के द्वारा युवा पीढ़ी को प्रदान किया जाता है। माता-पिता इससे अंजान हैं कि वे अनैतिक आवेग को नियंत्रण नहीं करने के द्वारा अपने बच्चों को एक शराबी और मादक अशक्ति का सर्वनाश के साथ समाविष्ट कर रहा है। परमेश्वर का नैतिक सिद्धांत को लापरवाही के साथ अनादार किया गया है। एक शक्तिशाली पुकार स्वर्ग की और उठना चाहिए। हम स्वयं को और अपने बच्चों को कैसे बचा सकते हैं?

हमारे घर, स्कूल और कॉलेज ऐसे उत्कृष्ट नागरिक तैयार नहीं कर सकता जो हमारे देश को जरूरत है, जबकि माता-पिताएँ, शिक्षकों और अध्यापकों की शिथिलता के कारण मद्यपान और नशीली पदार्थ (ड्रग्स) का इस्तेमाल को बर्दाशत और प्रोत्साहित किया जाता है। स्कूलों का टूटा हुआ नैतिक स्थिती हमें भयभीत करता है। सिर्फ कुछ ही वर्ष पहले विधार्थियों को निम्न स्तर के नैतिक आचरण व्यवहार करने का अनुमति देने में शिक्षक और अध्यापकों का उदारता के कारण उन्हें बरखास्त किया जाता था।

मादक का इस्तेमाल, आम लोगों का आदर्श को बुरी तरह से भ्रष्ट करता है। विचार, चरित्र और जीवन को नाश करता है। यह मनुष्यों के जीवन में आशीष के लिए दिया हुआ परमेश्वर का पवित्र संस्थापन परिवार को विभाजित और विनाश करता है।

मादक का जोखिम के साथ अवैध शराब के इस्तेमाल में बढ़ोतरी जोड़ा गया है। इन मादकों का बुरा प्रभाव किसी प्रकार के लाभ से भी भारी हानीकारक है। मादक का इस्तेमाल बुरे विचार और मानसिक मनोविकृति का कारण बन सकता है। मादक का इस्तेमाल करने वाले यह स्वीकार करते हैं कि यह एक मानसिक, शारीरिक और आत्मिक मृत्यु यात्रा है। इस मादक आशक्ति का दुःखपूर्ण परिणाम हमेशा मस्तिष्क को क्षति पहुँचाना, हत्या करना और आत्महत्या करना है।

लोग अपने जन्मजात पाप के कारण, तत्परता से उन झुकाव और मनोभाव का अनुगमन करते हैं जो शैतान ने तैयार किया है। इस अवस्था में शरीर अनियंत्रित संतुष्टि की खोज करता है। यौन अनैतिकता कामुकता की आग को नहीं बझा सकता पर यह ईंधन देता है। अवैध यौन सक्रियता कामुकता का समाधान नहीं है जैसे मद्यपान मदात्यय का समाधान नहीं है। सत्य यह है हमें हमारे कामुकता का सामना करना हैं। आत्मा का वह अंश जो अनन्तकाल तक जीवित रहता है, जब परमेश्वर का उद्धार के लिए आगे बढ़ता है, उनकी व्यवस्थाओं को सम्मान करने की खोजी करता है।

व्यभिचार, परस्त्रीगमन, समलिंगरति और पशुओं के साथ यौन सम्पर्क परमेश्वर के वचन में निषिद्ध किया गया है। (लैव्यव्यवस्था १८:२३; गलातियों ५:१९-२१)। अनैतिकता पीड़ा, मर्मभेदी दुःख, शोक संतप्तता, पाप और यौन आनुवंशिक बीमारी लेकर आता है। विशुद्धता स्वतः योग्यता और गरिमा का भाव लाता है। यह कल्पना करना घोर विरूपण है कि उँची विशिष्ट सिद्धांत वाले जब विपत्ति में जी रहे हैं तब निम्न नैतिक व्यक्ति के पास एक परम आनन्द और पूर्णता का जीवन है।

पाप और निर्लज्ज नास्तिकता का आध्यात्मिक अंधापन और अनैतिकता का दलदल के बीच, पवित्र बाइबल नैतिक व्यवहार का स्तर निश्चित करता है। सही और गलत के विषय में यह अविवाद्य और अनन्तकालीन अधिकार है।

मनुष्य जाति का प्रसारण के लिए और पति-पत्नी के बीच विवाह बंधपत्र का संवृद्धि के लिए परमेश्वर ने मनुष्य को यौन प्रवृति के साथ सृष्टि किया। वह इस इच्छा की परिपूर्णता को सिर्फ न्यायपूर्ण विवाह के अन्दर स्वीकृति देता है। (विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और विवाह-बिछौना निष्कलंक रहे, क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा।) (इब्रानियों १३:४)।

रोमियों के पुस्तक में प्रेरित पौलुस ने समलिंगरति पर परमेश्वर का न्याय के विषय में लिखा है। (इसलिए परमेश्वर ने उन्हें नीच कामनाओं के वश में छोड़ दिया; यहाँ तक कि उनकी स्त्रियों ने भी स्वाभाविक व्यवहार को उससे जो स्वभाव के विरूद्ध है, बदल डाला। वैसे ही पुरूष भी स्त्रियों के साथ स्वाभाविक व्यवहार छोड़कर आपस में कामातुर होकर जलने लगे, और पुरूषों ने पुरूषों के साथ निर्लज्ज काम करके अपने भ्रम का ठीक फल पाया, तो परमेशमवर ने भी उन्हें उनके निकम्मे मन पर छो

ड़ दिया कि वे अनुचित काम करें। वे तो परमेश्वर की यह विधि जानते हैं कि ऐसे ऐसे काम करनेवाले मृत्यु के दण्ड के योग्य हैं तौ भी न केवल आप ही ऐसे काम करते हैं वरन करनेवालों से प्रसन्न भी होते हैं) (रोमियों १:२६-२८, ३२)। यह सदोम और अमोरा का घृणित पाप था और उनपर परमेश्वर का न्याय उतर आता था (उत्पत्ति १९) शास्त्र के अनुसार यदि हम इन पापों में जीते हैं और उसे अभ्यास करते हैं तो पवित्र आत्मा को हमारे हृदय में रखना और मसीही जीवन जीना असम्भव है।

प्रिय पाठक, वास्तव में जीवन में खुश होने के लिए, स्वयं के साथ और परमेश्वर के साथ शान्ति में रहने के लिए, आपको अवश्य उनके साथ सहभागिता में आना होगा। पहचानिये और स्वीकार कीजिए कि आप एक पापी हैं और विश्वास कीजिए की यीशु आपके पापों को वहन कर क्रूस पर मरे। विजय आपका प्रतिक्षा कर रहा है।

जैसे ही आप अपने हृदय को परमेश्वर के लिए खोलेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगे, वह आपको क्षमा करेगा। (यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है) (१ युहन्ना १:९)।

स्वेच्छा से अपने सम्पूर्ण जीवन को अपने उद्धारकर्त्ता यीशु को समर्पित कीजिए और सच्ची आज्ञाकारिता में उनके वचन और पवित्र आत्मा का अनुगमन कीजिए। शुद्ध विचार एक परिवर्तित जीवन का आशीष है जो हमारे कार्य और क्रियाकलाप में अद्भुत बदलाव लाता है। मसीह आपके जीवन की समस्याओं का सामना करने के लिए साहस देगा और आपके उपर हमला करने वाली परिक्षाओं से विजय पाने की सामर्थ्य देगा। अब यीशु के पास आईये, वह आपको बुला रहा है। (जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो; ) (यशायाह ५५:६)।